
ढाका/बीजिंग: तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई बांग्लादेश सरकार ने भारत की आपत्तियों को नजरअंदाज करते हुए तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन एवं पुनर्स्थापन परियोजना (TRCMRP) के लिए औपचारिक रूप से चीन से सहयोग मांगा है। बांग्लादेश के इस कदम को भारत और ढाका के रिश्तों में बढ़ती दूरी के तौर पर देखा जा रहा है। तीस्ता नदी पूर्वी हिमालय से निकलकर Sikkim और West Bengal से होते हुए बांग्लादेश पहुंचती है, जहां यह सिंचाई और लाखों लोगों की आजीविका का अहम स्रोत है। ऐसे में इस परियोजना में चीन की बढ़ती भूमिका भारत के लिए रणनीतिक चुनौती मानी जा रही है।
बीजिंग में हुई अहम बैठक
बांग्लादेश की सरकारी समाचार एजेंसी BSS के मुताबिक, बांग्लादेश के विदेश मंत्री Khalilur Rahman और चीन के विदेश मंत्री Wang Yi के बीच बुधवार को Beijing में उच्चस्तरीय बैठक हुई। इस दौरान तीस्ता परियोजना सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की गई।
बैठक में वांग यी ने नई बांग्लादेश सरकार का समर्थन करते हुए चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) परियोजना को बांग्लादेश की विकास रणनीतियों से जोड़ने की बात कही। उन्होंने बुनियादी ढांचे और आर्थिक क्षेत्रों में चीनी निवेश बढ़ाने का भरोसा भी दिया। हालांकि, भारत की संभावित चिंताओं को देखते हुए चीन ने यह भी कहा कि दक्षिण एशिया में उसके संबंध किसी तीसरे देश को निशाना बनाने के लिए नहीं हैं।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर के करीब है परियोजना
चीन लंबे समय से तीस्ता नदी परियोजना में रुचि दिखाता रहा है। यह प्रोजेक्ट भारत के संवेदनशील ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ यानी ‘चिकन नेक’ के बेहद करीब स्थित है, जो पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। इसी रणनीतिक महत्व को देखते हुए भारत ने वर्ष 2024 में तीस्ता बेसिन के लिए तकनीकी और संरक्षण सहायता की पेशकश की थी।
गौरतलब है कि विदेश मंत्री खलीलुर रहमान हाल ही में भारत दौरे पर भी आए थे, जिस पर चीन की नजर बनी हुई थी। Sheikh Hasina के सत्ता से हटने और Muhammad Yunus की अंतरिम सरकार बनने के बाद से बांग्लादेश का झुकाव चीन और पाकिस्तान की ओर बढ़ता नजर आ रहा है।
गंगा जल संधि पर भी बढ़ा दबाव
भारत और बांग्लादेश के बीच जल बंटवारा लंबे समय से संवेदनशील मुद्दा रहा है। वर्ष 1996 में दोनों देशों के बीच गंगा नदी के जल बंटवारे को लेकर 30 साल की संधि हुई थी। यदि दोनों देश आपसी सहमति से इसका नवीनीकरण नहीं करते हैं, तो यह समझौता इसी साल समाप्त हो जाएगा।
ऐसे समय में बांग्लादेश का चीन के साथ आर्थिक और कूटनीतिक संबंध मजबूत करना भारत की विदेश नीति के लिए नई चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।





