- रिपोर्ट: अमित कुमार
लखनऊ। अगर किसी पत्रकार के साथ पुलिसकर्मी अभद्रता, गाली-गलौज, धमकी, मारपीट या अवैध रूप से हिरासत में लेने जैसी कार्रवाई करते हैं, तो उनके खिलाफ भी आपराधिक मुकदमा दर्ज हो सकता है। वर्दी कानून से ऊपर नहीं है और कार्रवाई भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के तहत होती है।
किन स्थितियों में कौन-सी धाराएँ?
- गाली-गलौज/अपमान
-BNS धारा 352 – जानबूझकर अपमान कर शांति भंग करने की नीयत से उकसाना।
-BNS धारा 296 – सार्वजनिक स्थान पर अश्लील शब्द/कृत्य। - धमकी देने पर
-BNS धारा 351 – आपराधिक डराना-धमकाना। - धक्का-मुक्की या मारपीट
-BNS धारा 115/117 – साधारण या गंभीर चोट (चोट की प्रकृति पर निर्भर)।
-BNS धारा 131 – हमला या आपराधिक बल का प्रयोग। - अवैध हिरासत/रोकना
-BNS धारा 127 – गलत तरीके से रोकना।
-BNS धारा 126 – गलत तरीके से कैद करना। - अधिकार का दुरुपयोग (लोक सेवक द्वारा)
-BNS धारा 220 (पूर्व IPC 166) – कानून की अवहेलना कर नुकसान पहुँचाना।
-BNS धारा 221 (पूर्व IPC 167) – गलत रिकॉर्ड/आदेश बनाकर नुकसान पहुँचाना। - महिला पत्रकार के मामले में
-BNS धारा 74 – शीलभंग से संबंधित अपराध।
-BNS धारा 79 – शब्द/हावभाव से मर्यादा का अपमान।
शिकायत कहाँ करें?
पीड़ित पत्रकार उच्चाधिकारियों (SP/SSP), जिला पुलिस कार्यालय, पुलिस शिकायत प्राधिकरण या न्यायालय में परिवाद दाखिल कर सकते हैं। मानवाधिकार उल्लंघन की स्थिति में राज्य या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का दरवाजा भी खटखटाया जा सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सबूत—वीडियो, ऑडियो, गवाह और मेडिकल रिपोर्ट—मामले को मजबूत बनाते हैं। स्पष्ट है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी पुलिस की है, लेकिन यदि कोई पुलिसकर्मी कानून का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ भी विधि सम्मत कार्रवाई संभव है।




