
-दुर्गा मंदिर से आएगी गौरा के गौने की पावन हल्दी
-मंगलवार को टेढ़ीनीम महंत आवास पर सजेगा मंगल मंडप
-रंगभरी एकादशी तक गूंजेंगे लोकगीत और वैदिक मंत्र
- रिपोर्ट: पंकज झा
वाराणसी। देवाधिदेव की नगरी काशी में महाशिवरात्रि के पश्चात अब शिव-विवाह की रस्मों का अगला और अत्यंत भावपूर्ण अध्याय प्रारंभ होने जा रहा है। रंगभरी एकादशी से पूर्व माता गौरा के गौने की परंपरागत हल्दी चढ़ाने की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। 24 फरवरी, मंगलवार को सायंकाल 7 बजे टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पर माता गौरा की चल प्रतिमा को विधि-विधानपूर्वक गौने की हल्दी अर्पित की जाएगी। सदियों से चली आ रही इस लोकपरंपरा में काशीवासियों की आस्था, सहभागिता और भावनात्मक जुड़ाव स्पष्ट रूप से झलकता है।
इस वर्ष भी गौने की हल्दी काशी के प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर से विशेष पूजन के उपरांत महंत परिवार द्वारा लाई जाएगी। नौ गौरी और नौ दुर्गा के आव्हान मंत्रों से अभिमंत्रित यह हल्दी केवल एक अनुष्ठानिक सामग्री नहीं, बल्कि श्रद्धा, शास्त्र और लोकविश्वास का संगम मानी जाती है।
नौ गौरी–नौ दुर्गा के मंत्रों से अभिमंत्रित होगी हल्दी
दुर्गा मंदिर के महंत कौशल द्विवेदी ने बताया कि काशी की प्राचीन लोकपरंपरा के अनुसार गौरा के गौने का दायित्व स्वयं काशीवासियों द्वारा निभाया जाता है। विवाह के उपरांत जिस प्रकार घर-परिवार में दुल्हन को गौने से पूर्व हल्दी लगाई जाती है, उसी भाव से माता गौरा को भी यह मंगल-रस्म अर्पित की जाती है।
उन्होंने बताया कि 27 फरवरी को पड़ने वाली रंगभरी एकादशी से पूर्व 24 फरवरी को दुर्गा मंदिर में विशेष अनुष्ठान संपन्न होगा। काशी की नौ देवीयों और नौ गौरियों के आव्हान मंत्रों के साथ हल्दी को विधिवत पूजित किया जाएगा। इसके पश्चात महंत परिवार इसे शोभायात्रा स्वरूप टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास तक लेकर पहुंचेगा। यह परंपरा केवल धार्मिक विधान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह काशी की सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है।
टेढ़ीनीम महंत आवास में सजेगा भव्य अनुष्ठान
काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत पं. वाचस्पति तिवारी ने बताया कि टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास में गौरा के गौने की रस्में सैकड़ों वर्षों से संपन्न होती चली आ रही हैं। यह स्थान केवल एक आवास नहीं, बल्कि लोकपरंपरा का जीवंत केंद्र है, जहां शास्त्र और लोकाचार का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।
24 फरवरी को हल्दी चढ़ाने से पूर्व माता गौरा का 11 वैदिक ब्राह्मणों द्वारा विशेष पूजन किया जाएगा। वेद मंत्रों की गूंज, शंखध्वनि और घंटानाद के बीच गौरा की चल प्रतिमा को मंडप में विराजमान किया जाएगा। पूजन उपरांत परंपरागत रीति से हल्दी अर्पित की जाएगी।इसके बाद माता गौरा का भव्य श्रृंगार होगा। काशी की पारंपरिक शैली में वस्त्र, आभूषण और पुष्पों से सुसज्जित गौरा का स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए दिव्य दर्शन का अवसर बनेगा।
लोकगीतों से गुंजायमान होगा वातावरण
गौने की हल्दी केवल वैदिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकजीवन का उत्सव भी है। जैसे ही हल्दी की रस्म आरंभ होगी, महंत आवास में मंगलगीतों और सोहर की गूंज सुनाई देगी। काशी की महिलाएं पारंपरिक गीतों के माध्यम से इस अवसर को भावपूर्ण बनाती हैं।लोकमान्यता है कि बाबा और गौरा केवल आराध्य देव नहीं, बल्कि काशी के परिवार के सदस्य हैं। यही कारण है कि गौने की रस्म में पूरे नगर की आत्मीय सहभागिता रहती है। श्रद्धालु स्वयं को इस पारिवारिक उत्सव का हिस्सा मानते हैं।
रंगभरी एकादशी तक चलेगा मांगलिक क्रम गौने की हल्दी से प्रारंभ हुआ यह मांगलिक क्रम रंगभरी एकादशी तक निरंतर चलता रहेगा। रंगभरी एकादशी वह पावन अवसर है जब बाबा विश्वनाथ माता गौरा को ससुराल से विदा कर अपने धाम लाते हैं। इस दिन अबीर-गुलाल और पुष्पवर्षा से संपूर्ण काशी रंग और भक्ति में डूब जाती है।
महंत परिवार के अनुसार इस वर्ष भी सभी व्यवस्थाओं को सुव्यवस्थित ढंग से अंतिम रूप दिया जा रहा है। श्रद्धालुओं की सुविधा, अनुष्ठान की शुद्धता और परंपरा की गरिमा को बनाए रखने के लिए विशेष प्रबंध किए जा रहे हैं।काशी की सांस्कृतिक आत्मा का उत्सव गौरा के गौने की हल्दी काशी की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है। यहां वेद और लोक एक-दूसरे के पूरक हैं। जहां एक ओर ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार होता है, वहीं दूसरी ओर लोकगीतों की मधुर ध्वनि वातावरण को भावविभोर कर देती है।यह आयोजन केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण है।
काशी की यही विशेषता है कि यहां देव-परंपरा भी परिवार की तरह निभाई जाती है 24 फरवरी की संध्या जब दुर्गा मंदिर से पूजित हल्दी टेढ़ीनीम पहुंचेगी और माता गौरा के अंग-अंग पर अर्पित होगी, तब काशी एक बार फिर अपनी आध्यात्मिक विरासत के साक्ष्य प्रस्तुत करेगी। रंगभरी एकादशी तक चलने वाला यह मंगलमय क्रम श्रद्धालुओं को भक्ति, उल्लास और लोकसंस्कृति के रंगों से सराबोर कर देगा।
देवों की नगरी काशी में यह परंपरा केवल इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान में जीवित आस्था है—जहां हर वर्ष गौरा का गौना नगर को एक सूत्र में पिरो देता है और यह संदेश देता है कि परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब समाज उन्हें उत्सव बनाकर निभाता है।





