
मेरी कलम से…
“क़ानून ने खोल दी सलाख़ें, वो बाहर सांसें भर गया,
इधर अदालत के साये में, पीड़ित परिवार बिखर गया।”
- अनुपम श्रीवास्तव
गोरखपुर: उन्नाव रेप केस में दोषी ठहराए गए कुलदीप सिंह सेंगर को दिल्ली हाई कोर्ट से बेल मिलते ही देश की अंतरात्मा एक बार फिर कांप उठी।
इस फैसले पर निर्भया की मां का कहना— “बेल नहीं मिलनी चाहिए थी”— केवल एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की सामूहिक पीड़ा की आवाज़ है। यह वही आवाज़ है जो हर बार न्याय के दरवाज़े पर उम्मीद लेकर जाती है और अक्सर खाली हाथ लौटती है।
यह सवाल अब सिर्फ एक केस का नहीं रहा। सवाल यह है कि क्या भारत में बलात्कार पीड़िता के लिए न्याय वास्तव में अंतिम पड़ाव है या सिर्फ एक लंबी, थकाऊ और टूटन भरी यात्रा? जब एक दोषी, जिसे निचली अदालत उम्रकैद की सजा दे चुकी है, वह कानूनी प्रक्रियाओं के सहारे बाहर आता है—तो पीड़िता और उसका परिवार किस जेल में बंद हो जाता है? डर की, असुरक्षा की और आजीवन मानसिक यातना की जेल में।
निर्भया की मां का बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने सिर्फ अपनी बेटी के लिए नहीं, बल्कि हर उस बेटी के लिए संघर्ष किया है, जिसे न्याय मिलने से पहले व्यवस्था ने थका दिया। जब वही मां कहती हैं कि बेल नहीं मिलनी चाहिए थी, तो यह न्यायपालिका पर सीधा हमला नहीं, बल्कि न्याय प्रणाली के मानवीय पक्ष पर गंभीर सवाल है।
कानून यह तर्क देता है कि बेल सजा की माफी नहीं होती, अपील लंबित रहने तक राहत होती है। लेकिन समाज यह पूछता है—क्या कानून की भाषा इतनी ठंडी हो गई है कि उसे पीड़िता के भय, उसकी टूटती सांसें और उसके परिवार का उजड़ना दिखाई नहीं देता? क्या न्याय केवल काग़ज़ी संतुलन बनकर रह गया है?
उन्नाव केस कोई साधारण मामला नहीं था। इसमें सत्ता का दुरुपयोग, पीड़िता पर दबाव, परिवार पर हमले और गवाहों की मौत तक शामिल रही। ऐसे मामले में दोषी को बेल मिलना यह संदेश देता है कि ताकत, रसूख और धैर्य सब कुछ हो तो सलाखें भी अस्थायी हो सकती हैं।
आज देश के हर माता-पिता के मन में डर है। हर बेटी के सवाल हैं। और हर आम नागरिक के भीतर एक चुभन—कि क्या न्याय सिर्फ फैसलों में लिखा जाता है, या वह पीड़ित के जीवन में भी उतरता है?
निर्भया की मां की बात को देश को समझना होगा। यह गुस्सा नहीं, यह अनुभव से निकली चेतावनी है। अगर ऐसे मामलों में भी व्यवस्था कठोर नहीं हुई, तो अदालतें भले फैसले सुनाती रहें, लेकिन जनता के मन से न्याय पर भरोसा धीरे-धीरे खिसकता चला जाएगा।
आज जरूरत सिर्फ कानून की व्याख्या की नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, साहस और नैतिक स्पष्टता की है। वरना इतिहास यह दर्ज करेगा कि हमने कानून तो बचा लिया, लेकिन न्याय हार गया।
मैं बस इतना कहना चाहूंगा…
जब बलात्कारी बाहर आता है,
तो सिर्फ एक दरवाज़ा नहीं खुलता—
पूरा भरोसा द़रक जाता है।
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