
- रिपोर्ट: अनुराग सिंह बिष्ट
उत्तराखंड: राज्य में विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन रुकने का नाम नहीं ले रहा है। अब तो हालात ऐसे हो गए हैं कि लोग नदी की जमीन तक बेचने लगे हैं। सवाल उठता है कि आखिर बहती नदी की ज़मीन किसी के नाम कैसे हो सकती है?
हर साल आपदाएं झेलने के बावजूद प्रशासन और स्थानीय लोगों ने अब तक कोई सबक नहीं सीखा। जहां पहले दो-चार मकान बनते हैं, वहीं धीरे-धीरे संख्या बढ़ती जाती है और कुछ ही सालों में पूरी बस्ती बस जाती है। लेकिन जब नदी प्रचंड वेग से अपना रास्ता वापस लेती है, तब सब कुछ बहा ले जाती है — फिर रह जाती है बस तबाही और अफसोस।
फिलहाल हालात यही हैं कि प्रकृति को नुकसान पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही। अगर समय रहते चेतावनी न ली गई, तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।





