
- रिपोर्ट: अनुराग सिंह बिष्ट
लखनऊ: राजधानी लखनऊ के ट्रांसपोर्ट नगर स्थित आरटीओ कार्यालय में तैनात नए संभागीय निरीक्षक (RI) सुशील यादव पर गंभीर आरोप लगे हैं। उन पर आवेदकों और पब्लिक के साथ अभद्र व्यवहार, फाइलें फेंकने, और काम में मनमानी करने का आरोप है, जिससे कार्यालय का माहौल पूरी तरह अराजक हो गया है।
बताया जा रहा है कि सुशील यादव खुद को मुख्यमंत्री से सीधे संबंध में होने का दावा करते हैं और गोरखनाथ मठ और वरिष्ठ IAS अधिकारियों का नाम लेकर लोगों पर दबाव बनाते हैं। यह रवैया प्रदेश सरकार की पारदर्शिता और ईमानदार छवि को धूमिल कर रहा है।
कार्यालय में अफसरशाही का बोलबाला
स्थानीय लोगों और आवेदकों का कहना है कि जब से सुशील यादव ने कार्यभार संभाला है, सैकड़ों फाइलें अप्रूवल के बिना पेंडिंग पड़ी हैं। आम नागरिकों को बेवजह नए नियम बताकर वापस भेज दिया जाता है, जबकि दलालों के जरिए आने वाली फाइलों को तुरंत पास कर दिया जाता है। इससे आम जनता में रोष और भय का माहौल पैदा हो गया है।
फाइलें फेंकने और अपमानजनक भाषा का प्रयोग
कई प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि सुशील यादव ने आवेदकों की फाइलें हाथ में लेकर फेंकी और उनके साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किया। इस व्यवहार से ना केवल जनता नाराज है, बल्कि यह आचरण नियमावली का खुला उल्लंघन भी है।
राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव की धौंस
सुशील यादव द्वारा बार-बार अपने गोरखपुर निवासी होने और मुख्यमंत्री से जुड़े होने का हवाला दिया जाता है। वह अधिकारियों के नाम का उपयोग कर आम जनता को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं, जिससे सरकारी सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
पारदर्शिता पर गंभीर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश सरकार की “जीरो टॉलरेंस” नीति और पारदर्शी शासन प्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आवेदकों और जनप्रतिनिधियों की मांग है कि मामले की उच्च स्तरीय जांच करवाई जाए और दोषी अधिकारी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो।
यह मामला शासन-प्रशासन के लिए एक चेतावनी है कि नीचे स्तर पर हो रहे दुर्व्यवहार और भ्रष्टाचार को नजरअंदाज करना जनता के विश्वास को खोने का कारण बन सकता है।





