
- रिपोर्ट: प्रतीक वार्ष्णेय
हाथरस: जनपद के मुरसान सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर 22 जुलाई 2025 को हुए औचक निरीक्षण में चिकित्सा व्यवस्थाओं की खस्ताहाली उजागर हुई। अपर मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. राजीव गुप्ता द्वारा किए गए निरीक्षण में कई अनियमितताएं और लापरवाहियाँ सामने आईं, जिससे स्पष्ट होता है कि स्वास्थ्य विभाग की जमीनी व्यवस्था पूरी तरह लड़खड़ा चुकी है।
निरीक्षण के दौरान प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. चन्द्रवीर सिंह तो मौजूद थे, लेकिन 26 जून को हुए पिछले निरीक्षण की अनुपालन रिपोर्ट अब तक उपलब्ध न कराना गंभीर सवाल खड़े करता है। यह न केवल लापरवाही का प्रतीक है, बल्कि उच्चाधिकारियों के निर्देशों की अनदेखी भी है।
स्टाफ उपस्थिति पंजिका में दंत रोग विशेषज्ञ डॉ. मितांशी सिंह का अवकाश दर्ज था, परंतु संविदा स्टाफ नर्स संगम और सपना की उपस्थिति दर्ज नहीं पाई गई। प्रभारी अधिकारी ने सफाई दी कि दोनों नर्सें अलग-अलग शिफ्ट में कार्यरत हैं, परंतु बिना दस्तावेजी पुष्टि के यह दावा भी सवालों के घेरे में है।
बच्चों की जान पर संकट
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) की समीक्षा में चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि मानकों के अनुसार बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती ही नहीं किया गया। डॉ. अंशुल उपाध्याय ने दूरभाष पर बताया कि अब तक सिर्फ एक ही बच्चा भर्ती कराया गया, जो कि कार्यक्रम की असफलता और बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति घोर उदासीनता को दर्शाता है। प्रभारी चिकित्साधिकारी को डॉ. उपाध्याय से स्पष्टीकरण लेने के निर्देश दिए गए हैं।
जननी सुरक्षा योजना की भी अनदेखी
प्रसव वार्ड का निरीक्षण भी चिंताजनक रहा। भर्ती प्रसूता खुशबू ने बताया कि अब तक उसका बैंक खाता नहीं खुला है, जिसके चलते उसे योजना के अंतर्गत कोई लाभ नहीं मिल पाया। आशा कार्यकर्ता द्वारा प्रसव पूर्व कार्यों के बावजूद प्रोत्साहन राशि न देना, विभागीय उदासीनता को साफ दर्शाता है। ब्लॉक कार्यक्रम प्रबंधक को तीन कार्य दिवसों में जांच रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं।

डायरिया अभियान में भी घोर लापरवाही
सबसे चिंताजनक स्थिति ओपीडी में देखने को मिली, जहां दस्त और बुखार से पीड़ित एक 8 माह के बच्चे को जिंक की गोली और ORS नहीं दी गई, जबकि दस्त रोकथाम अभियान अभी भी जारी है। इससे स्पष्ट है कि प्रचारित योजनाओं का जमीनी लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
कुल मिलाकर, स्वास्थ्य विभाग की यह स्थिति दर्शाती है कि ज़मीनी अमला न सिर्फ लापरवाह है, बल्कि जवाबदेही से भी कोसों दूर है। यदि तत्काल कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो इसका असर सीधे आम जनता की जान-माल पर पड़ेगा।





