
संवाददाता – मनोज कुमार यादव
एटा: जब किसी समाज में शिक्षा का दीपक मंद पड़ने लगे और नशे का धुआं गहराने लगे, तो समझ लीजिए कि वह समाज अपनी दिशा से भटक चुका है। आज हमारे गांवों-कस्बों में यही होता दिखाई दे रहा है। एक ओर सरकारी विद्यालयों पर ताले लगाने के आदेश हो रहे हैं, तो दूसरी ओर हर मोड़ पर सरकारी शराब की दुकानें सज-धज कर खुल रही हैं। यह विडंबना नहीं, बल्कि हमारी प्राथमिकताओं की असल तस्वीर है।
सरकारें दावा करती हैं कि वे शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं बना रही हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि प्राथमिक विद्यालयों का विलय हो रहा है, शिक्षकों की कमी बनी हुई है और स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। दूसरी ओर, शराब ठेके खोलने के लिए न तो जगह की कमी है, न बजट की और न ही मंजूरी की कोई समस्या।
जहां बच्चों को किताबों से दोस्ती होनी चाहिए, वहां वे नशे की ओर खिंच रहे हैं। जिस उम्र में उनका मन विज्ञान, गणित, इतिहास की ओर उन्मुख होना चाहिए, वहां बीयर, शराब और सिगरेट जैसे ज़हर उनका भविष्य निगल रहे हैं। यह सिर्फ एक पीढ़ी नहीं, पूरे समाज का पतन है।
आज गांवों में शिक्षा के मंदिर सन्नाटे में डूबे हैं और शराब के अड्डे चहल-पहल से भरे हुए। कुछ स्थानों पर तो विद्यालय के बगल में ही शराब की दुकान खुली हुई है – सोचिए, हम आने वाली पीढ़ी को क्या सिखा रहे हैं?
अगर आज हमने शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दी, तो आने वाला कल अंधकारमय होगा। अगर हमने मधुशालाओं को बंद कर पाठशालाओं को फिर से नहीं खोला, तो अगली पीढ़ी किताबों की जगह शराब की बोतलों में अपना भविष्य डूबो देगी।





